Sunday, 14 August 2016

मैं रचना करने लगी हूँ !
 क्या मैं रचना करने लगी हूँ ?
 ह्रदय ने सोचा , क्या ये सच है ?
मन ने धीरे से कानों में फुसफुसाया
  ये तो मेरे अंतर्मन की
  दबी चाहत है , जिससे मैं
  केवल कोरे कागज को
  रंगीन बना रही हूँ |

कुछ कहे - कुछ अनकहे किस्सों को
  कागज़ पर दोहरा रही हूँ |
जीने की  एक  नयी  राह  खोजी  है मैंने ,
जिस पर अनवरत बढ़ती जा रही हूँ |
  कुछ किस्से हैं बचपन के ,
  तो कुछ हैं मेरे यौवन के ,
  कुछ जुड़े हैं समाज से ,
तो कहीं चिंतित हैं बिखराव से ,

कहीं किस्सा है सावन की झड़ी का
तो कहीं चित्र उकेरा है प्रकृति के प्यार का,
कहीं हैं फूल-तितली, चाँद-तारे ,
 तो कहीं सूरज है साथ हमारे |
कहीं फ़िक्र है जब-तब डोलती
 धरा की ,तो कहीं विनय है
प्रकृति के लिए  थोड़े प्यार की ,

कहीं व्यक्त की है चिंता ,
बिगड़ते समाज की ,
तो कहीं प्रस्तुत की है -चाहत,
समाज सुधार की |
कहीं चाहा है मेरे मन ने ,
हर नर  में वास हो राम का ,हर 
माँ के ह्रदय में छलके वात्सल्य 
यशोदा सा ,बालपन हो लिए 
चंचलता कन्हैया की ,

भ्रातृ निष्ठा हो तो लक्ष्मण सी
भ्रातृ प्रेम हो तो भरत सा
मित्रता हो तो केवल कृष्ण-सुदामा सी|
कहीं कोई  घात-प्रतिघात हो ,
हर कहीं छिड़े केवल मानवता का राग हो ,
फ़ैल जाए चहुँ ओर प्रेम की हरियाली,
फिर हर दिन होगी प्रेम की होली ,
और रात में मनेगी दीवाली |

चाहतें तो बहुत हैं कुछ कर पाने की ,
बढ़ती जाती हूँ , यही सोचकर
कि क्या! ये सचमुच मेरी रचना है,
या मेरे अंतर्मन में छिपी अद्भुत
भावनाओं ,इच्छाओं का आइना है ,
जिसमें जीवन से जुड़े
हर पहलू का कहीं विकृत चेहरा,
तो कहीं सौंदर्य नजर आता है |

कहीं बारिश  की बूंदों में लाज से
सिमटता गोरी का रूप दिखता है ,
बचपन में लौट जाने की ललक है कहीं ,
तो कहीं कंक्रीट के जंगलों
 में भी वसंत आता है |

क्यों करूँ मैं विश्वास कि
ये रचनाएँ है मेरी ,
ये तो मेरा जीवन ,मेरे प्राण ,
अनकही कहानी है मेरी ,
जिसे  मैं शब्दों में पिरोकर
लय-ताल में सजाकर
सबके सम्मुख परोसने लगी हूँ |
हाँ ! जी हाँ मैं शब्दों के जाल में
स्वयं को बुनने लगी हूँ |
नीरा भार्गव  'नीर'





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