उलझनें सुलझ जाएँगी
उलझनों से बाहर
निकल कर
तो देखो ,
उलझनें सुलझ जाएँगी|
अशांत मन को
लगा दो उसकी
सेवा में
शांति स्वतः चली आएगी
|
कड़ी धूप में
चलते हुए ,पेड़
की छाँव में
बैठो
शीतलता ह्रदय के कोने
तक उतर जाएगी
|
पेड़ के पत्तों
को छू कर
तो देखो ,
कोमलता हाथों में सरसरायेगी
|
नवजात को छूने
से आती सुखद
अनुभूति का
बड़ा ही प्यारा
सा अहसास कराएगी
|
बारिश की सूचना
देते ,घुमड़ते काले
बादलों को देखो
,
अनेक आकृतियाँ नजर आएँगी
|
लौटा कर अतीत
में ,विवश कर
देंगी बच्चा बनने
को,
खिलखिलाती हँसी छूट
जाएगी |
स्पर्श किया है
कभी बारिश की
बूँदों का ?
एक बार करके
तो देखो ,
अंतर्मन तक भिगो
जाएँगी |
चातक की
भाँति मुँह उठाकर
आसमान को देखो
अमृत की बूँदें
सराबोर कर जाएँगी
|
कभी देखा है
प्रकृति को समीप
से ?
एक बार उपवन
में जाकर तो
देखो ,
सारी दुनिया अनुपम
नजर आएगी |
अपने दुखों को , पीड़ा
को दूसरों से
तोलकर तो देखो
,
अपनी बहुत बौनी
समझ आएँगी |
दूसरों की उलझनों
को जब देखोगे
करीब से ,
अपनी उलझनें स्वतः सुलझ
जाएँगी |
भूलकर सारे दुखों
को ,छोड़ दो
उलझनों को ,
पकड़ लो बाँह केवल
उसी की ,
जिसने बनाया हमें -तुम्हें
-सभी को ,
सारी दुनिया खूबसूरत नजर
आएगी |
सौंप दो सर्वस्व
उसी को ,
उलझनें स्वतः सुलझ जाएँगी
|
नीरा भार्गव 'नीर'
this poem is dedicated to all my dear ones
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