मैं रचना करने लगी हूँ !
क्या
मैं रचना करने
लगी हूँ ?
ह्रदय
ने सोचा , क्या
ये सच है
?
मन ने
धीरे से कानों
में फुसफुसाया
ये
तो मेरे अंतर्मन
की
दबी
चाहत है , जिससे
मैं
केवल
कोरे कागज को
रंगीन
बना रही हूँ
|
कुछ कहे
- कुछ अनकहे किस्सों
को
कागज़
पर दोहरा रही
हूँ |
जीने की एक नयी राह
खोजी है
मैंने ,
जिस पर
अनवरत बढ़ती जा
रही हूँ |
कुछ
किस्से हैं बचपन
के ,
तो
कुछ हैं मेरे
यौवन के ,
कुछ
जुड़े हैं समाज
से ,
तो कहीं
चिंतित हैं बिखराव
से ,
कहीं किस्सा
है सावन की
झड़ी का
तो कहीं
चित्र उकेरा है
प्रकृति के प्यार
का,
कहीं हैं
फूल-तितली, चाँद-तारे ,
तो
कहीं सूरज है
साथ हमारे |
कहीं फ़िक्र
है जब-तब
डोलती
धरा
की ,तो कहीं
विनय है
प्रकृति के लिए
थोड़े
प्यार की ,
कहीं व्यक्त
की है चिंता
,
बिगड़ते समाज की
,
तो कहीं
प्रस्तुत की है
-चाहत,
समाज सुधार
की |
कहीं चाहा
है मेरे मन
ने ,
हर नर में
वास हो राम
का ,हर
माँ के ह्रदय में छलके वात्सल्य
यशोदा सा ,बालपन हो लिए
चंचलता कन्हैया की ,
भ्रातृ निष्ठा हो
तो लक्ष्मण सी
भ्रातृ प्रेम हो
तो भरत सा
मित्रता हो तो
केवल कृष्ण-सुदामा
सी|
कहीं कोई
घात-प्रतिघात न हो
,
हर कहीं
छिड़े केवल मानवता
का राग हो
,
फ़ैल जाए
चहुँ ओर प्रेम
की हरियाली,
फिर हर
दिन होगी प्रेम
की होली ,
और रात
में मनेगी दीवाली
|
चाहतें तो बहुत
हैं कुछ कर
पाने की ,
बढ़ती जाती
हूँ , यही सोचकर
कि क्या!
ये सचमुच मेरी
रचना है,
या मेरे
अंतर्मन में छिपी
अद्भुत
भावनाओं ,इच्छाओं का
आइना है ,
जिसमें जीवन से
जुड़े
हर पहलू
का कहीं विकृत
चेहरा,
तो कहीं
सौंदर्य नजर आता
है |
कहीं बारिश की बूंदों में
लाज से
सिमटता गोरी का
रूप दिखता है
,
बचपन में
लौट जाने की
ललक है कहीं
,
तो कहीं
कंक्रीट के जंगलों
में
भी वसंत आता है
|
क्यों करूँ मैं
विश्वास कि
ये रचनाएँ
है मेरी ,
ये तो
मेरा जीवन ,मेरे
प्राण ,
अनकही कहानी है
मेरी ,
जिसे मैं
शब्दों में पिरोकर
लय-ताल
में सजाकर
सबके सम्मुख
परोसने लगी हूँ
|
हाँ ! जी हाँ
मैं शब्दों के
जाल में
स्वयं को बुनने
लगी हूँ |
नीरा भार्गव 'नीर'
well composed,today i come to know that my sis is a poetess.Keep it up.
ReplyDeleteThanks dear☺
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