Friday, 29 July 2016

      उलझनें सुलझ जाएँगी 
उलझनों से बाहर निकल  कर तो देखो ,
उलझनें सुलझ जाएँगी|
अशांत मन को लगा दो उसकी सेवा में
शांति स्वतः चली आएगी |
कड़ी धूप में चलते हुए ,पेड़ की छाँव में बैठो
शीतलता ह्रदय के कोने तक उतर जाएगी |
पेड़ के पत्तों को छू कर तो देखो ,
कोमलता हाथों में सरसरायेगी |
नवजात को छूने से आती सुखद अनुभूति का
बड़ा ही प्यारा सा अहसास कराएगी |
बारिश की सूचना देते ,घुमड़ते काले बादलों को देखो ,
अनेक आकृतियाँ नजर आएँगी |
लौटा कर अतीत में ,विवश कर देंगी बच्चा बनने को,
खिलखिलाती हँसी छूट जाएगी |
स्पर्श किया है कभी बारिश की बूँदों का ?
एक बार करके तो देखो ,
अंतर्मन तक भिगो जाएँगी |
 चातक की भाँति मुँह उठाकर आसमान को देखो
अमृत की बूँदें सराबोर कर जाएँगी |
कभी देखा है प्रकृति को समीप से ?
एक बार उपवन में जाकर तो देखो ,
सारी दुनिया  अनुपम नजर आएगी |
अपने दुखों को , पीड़ा को दूसरों से तोलकर तो देखो ,
अपनी बहुत बौनी समझ आएँगी |
दूसरों की उलझनों को जब देखोगे करीब से ,
अपनी उलझनें स्वतः सुलझ जाएँगी |
भूलकर सारे दुखों को ,छोड़ दो उलझनों को ,
पकड़ लो  बाँह केवल उसी की ,
जिसने बनाया हमें -तुम्हें -सभी को ,
सारी दुनिया खूबसूरत नजर आएगी |
सौंप दो सर्वस्व उसी को ,
उलझनें स्वतः सुलझ जाएँगी |

नीरा भार्गव  'नीर' 
 


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