चलो आज एक नया
बचपन जी लेते हैं
कुछ पुरानी
स्मृतियों को पुनः संजो लेते हैं
बड़ा याद आता है बचपन का वो सफर
बड़ा याद आता है बचपन का वो सफर
जिसमें न थी कोई
चिंता , हम थे बेफिकर
हर मौसम का मजा
लेते थे भरपूर
चाहे हो वो सर्दी
,गर्मी ,बसंत या वर्षा
बेपरवाही से आनंद
सबका लेते थे भरपूर
कड़क सर्दी में भी
सिर्फ एक स्वेटर में
निकल पड़ते थे
दोस्तों के घर
वहीं गरम चाय
पीना और
बड़ों की मीठी
डांट ऐसे खाना
जैसे चाय के साथ
बिस्कुट
यही हाल था गर्मी
में भी
भरी दुपहरी चल
पड़ते थे
जहाँ एक ओर पानी
के ठेले
तो दूसरी ओर
लबालब बिकता
नीबू पुदीने वाला
गन्ने का रस
भैयाजी मुझे भी
देना बार-बार
आवाज लगाते हाथ में जैसे ही
आया गिलास गटागट पी जाते
आज तक महसूस होती है रस
में मिले नीबू ,पुदीने की सुगंध
गूंजता है कानों में वही मधुर स्वर
आवाज लगाते हाथ में जैसे ही
आया गिलास गटागट पी जाते
आज तक महसूस होती है रस
में मिले नीबू ,पुदीने की सुगंध
गूंजता है कानों में वही मधुर स्वर
"पी लो-पी लो धरती
का अमृत
नीबू -पुदीने
वाला मीठा गन्ने का रस"
बारिश का तो बस हाल ही न पूछो
बादल दिखते ही मन नाचने लगता
बारिश का तो बस हाल ही न पूछो
बादल दिखते ही मन नाचने लगता
एक बून्द गिरी
जैसे ही, लगता ,
बस शुरू
होगी तेज बारिश
न सुनते बड़ों की, बस धुन रहती
कब हो तेज बारिश और भागें छत पर
न सुनते बड़ों की, बस धुन रहती
कब हो तेज बारिश और भागें छत पर
माँ छत से समेटती
सूखे कपडे
हम ताकते आसमान को कब होगी बारिश
हम ताकते आसमान को कब होगी बारिश
लो ! ये क्या
भगवान ने सुन ली हमारी
अब झमाझम शुरू हो गई बारिश
अब झमाझम शुरू हो गई बारिश
इस छत से उस छत
तक खूब दौड़ते
कभी बैठते ,कभी लेट आकाश देखते
कभी बैठते ,कभी लेट आकाश देखते
न कोई चिंता न
कोई फ़िक्र
अपनी मस्ती अपना
बचपन
नाव बना बहते
पानी में छोड़ते ,
बहते पानी संग स्वयं दौड़ते
दोस्तों संग होड़ लगाते
दोस्तों संग होड़ लगाते
दूर तक किसकी
जाएगी
एक एक कम्पट की
शर्त लगाते
जीत किसी भी हो हम तो केवल ख़ुशी
मनाते
छोटी -छोटी बातों
में खुश हो जाते
ख़ुशी छोटी हो या बड़ी सब मिल मनाते
ख़ुशी छोटी हो या बड़ी सब मिल मनाते
अब ! न रहा वो
बचपन न ही वो खुशियाँ
न रहा वो मौसम ,न दोस्त ,न ही वो गलियाँ
फिर भी मन तो मन है हवा से तेज
फिर भी मन तो मन है हवा से तेज
दौड़कर अतीत के
खजाने से
चुन लाता है मधुर
स्मृतियाँ
कर देता है
सराबोर बारिश की बूंदों सा
हम लौट जाते हैं,
खो जाते हैं उनमें
जी लेते हैँ अपना
एक नया बचपन |
नीरा भार्गव 'नीर'




बचपन कितना अल्हड ,मस्ती से भरपूर होता है ,न तो किसी प्रकार की चिंता होती है न दुःख | बस अपनी धुन में मगन रहते हैं ,जिए जाते हैं| हर मौसम का भरपूर आनंद उठाना ऐसे मस्ती भरे बचपन के दिनों की याद दिलाती है मेरी यह कविता |
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