वक्त से गुहार
ऐ वक्त , काश ! तू ठहरता, जी लेता
वो सुनहरे पल।
काश ! तुझमें भी होते वो जज्बात ,
होता तुझमें भी वो अहसास ,
तू भी तड़पता उन लम्हों के लिए ,
जो खुशियाँ देते हैं भरपूर ,
मर-मरकर जीने के लिये |
आज भी लौट जाता है मन वहीं ,
जहाँ से शुरू हुई जिन्दगानी ,
वो मुस्कराता बचपन ,वो अल्हड़ जवानी |
माँ के आँचल की वो शीतल छाँव ,
तो सदा याद दिलाती है, पिता की हर निशानी |
ऐ वक्त कर सकता है ,तो तू बस
इतना ही कर एक बार, लौटा दे बचपन मेरा,
जिसमें भीनी मुस्कराहटें हों , खिलखिलाती हँसी हो ,
भाई-बहनों का प्यार-स्नेह प्रगाढ़ हो |
लौटा दे मुझको ,बस एक , बार वे दिन ,
जब पकड़ बांह पापा की घूमती थी वो मेले,
प्रफुल्लित होता था मन, अकड़कर चलती पापा के संग
न जाने कहाँ खो गया मेरा वो प्यारा सा बचपन
बिछुड़ गई वो सखियाँ भूल गए हमें सहोदर ।
ऐ वक्त पकड़ा दे मुझे वही थैला आज फिर एक बार,
जिसमें होती थी आम,केले जैसे मीठे फलों की बहार
न जाने क्या-क्या लाते थे पापा ,
भरकर थैला बाजार से हर बार |
हुई कुछ बड़ी , तो छूटा बचपन ,
पर, न बदला पापा का वो पहले वाला प्यार ,
जो कहते थे कभी मुझसे ,कि उठा करो जल्दी ,
पर विवाह के बाद मेरे , कहते थे माँ से ,
सोने दो उसको , तुम्हें ऐसी क्या है जल्दी ,
माँ चाहती थीं कि वे करे मुझसे मन की बातें
पापा चाहते थे कि नींद हो पूरी, स्वयं ही वो जागे |
ऐ वक्त क्या तेरे पास भी हैं ऐसे कुछ मीठे लम्हे
कुछ है तेरे पास ऐसा , जिसके लिए तू तड़पे,
क्या सोचता है ,क्यों कुछ कहता नहीं तू
न है ऐसा कुछ भी तेरे पास, न है ऐसी धरोहर
तू तो है ही बड़ा निष्ठुर, इसलिए तेरे नाम भी हैं
बड़े ही अजीब से |
काल तेरा ही पर्याय है , है न!
जो समेट लेता है , सब कुछ चाहे सुख हों या दुःख
लील जाता है सब कुछ मिटा देता है हस्ती ,
डुबो देता है नैया मधुर रिश्तों की
है न ! तू बड़ा निष्ठुर और बेरहम दिल ,
फिर भी यदि तुझमें है कोई जज्बात ,
तो वापस लौटा दे मेरा बचपन ,
ऐ वक्त पहुंचा दे मुझे ,बस एक बार वहाँ
जहाँ थे मेरे माँ-पापा और सहोदर ,
खुशियों से गुलजार था हमारा वो आँगन ,
ऐ वक्त बस एक बार , एक बार लौटा दे
लौटा दे ,मेरे वो हसीन दिन -पल
Thank you so much
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