सानवी का संकल्प - जल संरक्षण {कहानी }
सानवी एक बहुत ही होनहार,बुद्धिमती,समझदार एवं प्यारी बच्ची है| उसके परनाना-नानी का घर बुंदेलखंड के झाँसी शहर में है| सानवी को ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानना बड़ा अच्छा लगता है | अब सानवी के परनाना--नानी तो है नहीं ] सो सानवी का वहाँ जाना नहीं होता है|वह अपनी माँ से ही वहाँ के बारे में जानकारियाँ प्राप्त करती रहती है| माँ भी बड़े ही उत्साह से सानवी को अपने बचपन की यादों के पिटारे से चुन-चुनकर किस्से--कहानियाँ सुनाती रहती हैं| इन सब किस्से--कहानियों को सुनाने के पीछे माँ का एक उददेश्य छिपा रहता है ,कि सानवी का मनोरंजन तो हो ही साथ ही उसे इनसे कुछ सीख भी मिले, जिससे वह समाज के हित में कुछ कार्य कर सके|
इस बार जब सानवी ने माँ से कुछ बताने का आग्रह किया तो माँ भी बड़ी उत्साहित थीं ]इस बार वो सानवी का उस ज्वलंत समस्या से साक्षात्कार करवाना चाहती थीं| जो देखने-सुनने में बड़ी हलकी प्रतीत होती है ] किन्तु इस पर लगाम न लगी तो भविष्य में भयावह रूप ले लेगी|
सानवी की माँ ने बताना आरम्भ किया कि सानवी जब गर्मियों की छुट्टियों में हम सब ममेरे-मौसेरे भाई--बहन एकत्रित होते थे, तो खूब धमा-चौकड़ी मचाते थे| हमारा मेल-मिलाप ]शैतानियों को देख-देखकर नाना-नानी बहुत प्रसन्न होते थे,किन्तु नानी को एक चिंता हमेशा रहती थी कि कहीं पानी की कमी न हो जाएA उनकी चिंता भी उचित थी कि एक तो बड़ा एवं संयुक्त परिवार, गर्मियों का मौसम और पानी की आपूर्ति आवश्यकता से कम| सानवी मेरी नानी बड़ी ही सुघड़ ]चतुर,दूरदर्शी गृहणी थीं| वे प्रातः काल होते ही हम बच्चों को कुऍं पर नहाने भेज देतीं थीं| हम सब ख़ुशी--ख़ुशी कुऍं पर नहाते और खूब मजे करते|
सानवी आश्चर्य से माँ को देख रही थी| उसने माँ से पूछ ही लिया माँ कुऍं पर, मैंने तो कभी कोई कुआँ नहीं देखा | माँ ने कहा हाँ सानवी पहले तो लगभग हर घर के आँगन में हुआ करते थे| झाँसी में माता का
प्राचीन एवं बड़ा मंदिर है]जिसके चारों पाँच
कुऍं हैं| रानी लक्ष्मीबाई के समय में इन्हीं कुओं के द्वारा पूरी झाँसी
में जल की आपूर्ति होती थी| पाँच कुऍं होने के
कारण उस क्षेत्र को पंचकुइयां के नाम से
जाना जाता है| सानवी एकदम से बोल उठी
-"हाँ -हाँ ये तो मुझे भी पता है "| आधुनिकता एवं विकास की अंधी दौड़ में संयुक्त परिवार बिखर गए और एकल परिवार में बदल गए| इस विघटन के कारण हुए बंटवारे से बहुमंजिले भवनों की नई संस्कृति ने जन्म लिया | इस कारण हमारे प्राकृतिक जल स्रोतों का पतन हुआ | कुछ कुऍं अनुपयोगी
समझ पाट दिए गए तथा कुछ उपेक्षा के कारण स्वयं ही पट गए| इस प्रकार मनुष्यों ने स्वयं ही नैसर्गिक स्रोतों की
अवहेलना की या यूँ भी कह सकते हैं सानवी कि हम मानवों ने अपने पैर पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारी है |माँ बता रही थीं कि प्राकृतिक सम्पदाओं से भरा है हमारा देश | प्राचीन काल में यूँ ही सोने की चिड़िया नहीं कहा जाता था| नदियों के इस देश
में न तो प्राकृतिक साधनों की कमी थी न ही विभिन्न कलाओं की ,जो हमें स्वस्थ एवं
चिरंजीवी रखने में सहायक थीं| यदि हम पुराने भवनों को देखे तो ज्ञात होगा कि वहाँ ए सी ] कूलर तो क्या साधारण से पंखे की आवश्यकताआज भी नहीं होगी|
सानवी का हृदय जल संकट को
लेकर बहुत विचलित था| वह घबरा रही थी कि
जो स्थिति लातूर में हुई] उसका सामना जल -संरक्षण की जागरूकता के
अभाव में कहीं सबको न करना पड़े| रह-रहकर उसके
मस्तिष्क में कुऍं ]तालाब] पोखर ]झरने घूम रहे थे| वह सोच रही थी कि
विकास होना अच्छी बात है पर प्राकृतिक साधनों की बलि देकर नहीं| सानवी ने बिना देर किये
निर्णय लिया कि वह जल संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास करेगी| सानवी के मन में घुमड़ते
बवंडर को माँ ने खूब पहचाना| माँ ने सानवी को आश्वासन दिया कि वे उसके इस निर्णय वे बहुत प्रसन्न हैं और वे सदैव उसकी सहायता भी करेंगी| माँ खुश थीं कि आज जो कुछ उन्होंने सानवी को बताया है |सानवी ने उसे बखूबी समझा है| आज माँ -बेटी बड़ी प्रसन्न है कि कहानी सुनाने का माँ का
उद्देश्य पूरा हुआ और बेटी का भी समाज एवं देश के प्रति कर्त्तव्य पूर्ति का मार्ग
प्रशस्त हुआ| जल संरक्षण अभियान
का आज से बल्कि अभी]अपने ही परिवार से ही आरम्भ करेगी| इसी संकल्प के साथ सानवी ने माँ को धन्यवाद
दिया और भविष्य में aएक नई सीख देने वाली नई कहानी सुनाने का वादा भी ले लिया|
नीरा भार्गव 'नीर'
No comments:
Post a Comment