कागज़ का एक पन्ना
अथक प्रयासों के बाद बना मैं ,
कागज़ का एक पन्ना,
सुन्दर,स्वच्छ, निराला
बन बैठा कापी का पन्ना ।
एकदम गोरा, बिलकुल कोरा ,
साफ़ और चिकना,
प्रथमवास था छापाखाना,
फिर दुकान का आला,
फिर चला विद्यालय ,
बन बच्चों की किस्मत का ताला।
बच्चे, कभी मुझे देखते,
कभी बना जहाज उड़ाते,
कभी फाड़कर गेंद बनाते,
बना नाव पानी में तैराते।
दुख नहीं है लेशमात्र भी,
इतराता हूँ अपने पर,
लाल और नीली स्याही से
जब सुन्दर लेख उतरता
मेरे कोरे, उजले तन पर।
इस सुन्दर लेखन में, खोज रहा हॅू
तुलसी, मीरा, सूर,कबीर,
और रहीम, रैदासा
बस - खास यही है, आस बड़ी है,
इक दिन होगी पूरी खोज
सार्थक होगा जीवन मेरा,
जब बनूँगा मैं कीमती पन्ना।
नीरा भार्गव 'नीर'
अकसर बच्चों को कापियों से पन्ने फाड़कर फेंकते हुए देखती, तो दुःख लगता कि कितनी मुश्किलों से कागज़ बनता है और बच्चों के हाथ में जाकर अनायास ही नष्ट होता है| फिर मन ने सोचा कि कुछ बच्चे ऐसे भी तो है जो इसका सदुपयोग करते है | सोचा कि शायद इन नन्ही पौध में कही कोई सूर- रहीम छुपा हो | बस इसी विश्वास ने इस कविता की रचना कर दी |
ReplyDeleteजहाँ बच्चे इस कविता से कागज न फाड़ने की प्रेरणा लेंगे वहीँ दूसरी ओर कुछ सुंदर करने को प्रेरित होंगे|
शुभकामना
नीरा भार्गव