हाँ मैंने गौरैया को देखा है !
"क
से
कबूतर,
ख
से
खरगोश,
ग
से
होती
गौरेया
"
ये शब्द अर्श
के मस्तिष्क में
बार-बार गूंज
रहे थे | अर्श ने
कबूतर भी देखा
था और खरगोश
भी पर , गौरेया
- उसने
इसे नहीं देखा
था | उसने निश्चय
किया कि आज
वह घर पहुँचते
ही दादी से
गौरैया के बारे
में पूछेगा कि" दादी क्या आपने गौरैया को देखा है"| घर पहुँचते
ही अर्श ने
बस्ता एक तरफ
रखा और दादी
से लिपट गया|
दादी ने भी
प्यार से दुलारते
हुए अर्श से
पूछा क्या बात
है बेटा! लगता
है ,आज आपने
जरूर कुछ नया
सीखा है
| दादी अर्श के
मन की बात
को भली -भांति
जानती है ,वह
अर्श के मन
के कोरे कागज
को पढ़ लेती
है| अर्श ने
भी बिना विलम्ब
के दादी से
गौरैया के बारे
में पूछ लिया
,और कहा कि,दादी क्या
आपने गौरैया को देखा
है | गौरैया का
नाम सुनते ही
दादी जी के
साथ-साथ दादाजी
की आँखे चमक
उठी| इस विलुप्त
होते जीव के
साथ जुडी
न जाने कितनी
खट्टी-मीठी यादें
उनके ह्रदय पटल
पर आज भी
अंकित है|
दादी ने
कहा " हाँ मैंने गौरैया को देखा है "| अर्श! ,पहले
खाना खा लो
फिर मैं तुम्हे
गौरैया के बारे
में बताऊँगी | फिर
तो अर्श ने
आज बिना किसी
ना-नुकुर के
खाना खाया , गृहकार्य
समाप्त किया और
दादी से बोला
,"दादी अब बताओ
गौरैया के बारे
में |"बस अब
क्या था ,दादी
और दादू में
तो जैसे होड़
ही लग गई
अपनी स्मृतियों को
उजागर करने की
|खैर ,दादी ने
आरम्भ किया सुनो अर्श
!," ये गौरैया एक छोटी
सी ,प्यारी सी
चिड़िया होती है
| इसके साथ एक
नर यानि कि
चिड़ा होता है
| हमारे समय में
ये जीव हमारे
घर का ,परिवार
का हिस्सा होते
थे" | दादा जी
से रुका न
गया , वे बोल
उठे -"जब हम
छोटे थे न
अर्श, तब होली
पर गौरैया को
अपने पसंद के
रंग में रंगकर
उड़ा देते थे
,जब वो वापस
आती थी तो
हम बच्चे अपनी-अपनी चिड़िया
को पहचान कर
खूब प्रसन्न होते
थे"| यह सुनते
ही अर्श आश्चर्य
चकित रह गया
| उसने दादी से
पुनः अनुरोध किया
कि वे गौरैया
के बारे में
सारी बात बताये
| दादी ने बात
आगे बढ़ाई और
बोली -"ये दोनों
प्राणी (नर-मादा)
मिलकर अपना घोंसला
हमारे घरो में
तस्वीरों के पीछे
ट्यूब लाइट की
आड़ में ,झरोखे
में या फिर
किसी सुविधाजनक स्थान
ढूंढ़कर बना लेते
थे| समय आने
पर घोंसले में
अंडे होते तथा
अण्डों से बच्चे
होते | दिनभर घर में
उनकी आवाजों से खूब
रौनक रहती | दिनभर
चिड़ा-चिड़िया बच्चों
के लिए दाना
लाते और उनके
छोटे-छोटे मुख(
चोंच ) में चोंच
से दाना खिलाते
| बड़ा ही मनोरम
दृश्य होता था
| अर्श के चेहरे
पर आते -जाते
भावों को दादी-
दादू ने बखूबी
जाना | अब अर्श
ने पूछ ही
लिया कि "दादी
ये अब क्यों
नहीं दिखती मुझे
भी तो देखना
है ,इतने प्यारे
जीव को "| दादा
जी ने कहा बढ़ती आबादी,
उद्योग -धंधों एवं
स्वार्थ के कारण
मनुष्य जंगलों को काटता
जा रहा है
| भूमि की कमी
के कारण घरों
से आँगन समाप्त
हो गए है
, परिवार भी एकल
हो गए हैं,
बड़े घरों की
जगह बहुमंजिली इमारतों
ने ले ली
हैं | इन्ही सब
कारणों से यह
नन्हा जीव अपना
अस्तित्व खोता जा
रहा है| यह
सुनकर अर्श अत्यंत
दुखी हो गया
और बोला दादी
"तो क्या मैं
कभी भी गौरैया
को नहीं देख
पाऊँगा ,मुझे वह
कभी नहीं दिखेगी
? " दादा जी ने
कहा"क्यों नहीं बेटा
, इस प्राणी का
अस्तित्व खतरे में
तो है किन्तु
इसे बचाने का
प्रयास किया जा
रहा है | जगह-जगह कृत्रिम
(बनावटी ) घोंसले बनाये जा
रहे हैं तथा
गौरैया पालन पर
ध्यान दिया जा
रहा है |"
अर्श ने दादी-दादू की
सारी बातें बड़े
ही ध्यान सी
सुनी| अर्श का
कोमल ह्रदय गौरैया
के सपने देखने
लगा | उसने अविलम्ब
संकल्प लिया कि
वह भी "गौरैया बचाओ" अभियान मेँ भाग
लेगा | इस अभियान
को वह अपनी
सोसाइटी मेँ भी
चलाएगा| बच्चों तथा बड़ों
को इस अभियान
के बारे मेँ
बताकर उन्हें जागरूक
करेगा | फिर वह
गौरैया को पुस्तक
मेँ नहीं बल्कि
बाग़-बगीचे में
,पार्क मेँ तथा
पेड़ों पर सजीव
देखेगा | घरों मेँ
फुदकती गौरैया को देखकर
उसे बड़ी प्रसन्नता होगी |
नीरा भार्गव 'नीर'
कहानी पढ़िए एवं बच्चों को भी पढाये
ReplyDeleteगौरैया बचाओ अभियान में भाग ले
प्रकृति का संरक्षण हम सबका दायित्व है