Wednesday, 16 March 2016


                        हाँ मैंने  गौरैया को देखा है !

" से कबूतर, से खरगोश, से होती गौरेया "
ये शब्द अर्श के मस्तिष्क में बार-बार गूंज रहे थे | अर्श  ने कबूतर भी देखा था और खरगोश भी पर , गौरेयाउसने इसे नहीं देखा था | उसने निश्चय किया कि आज वह घर पहुँचते ही दादी से गौरैया के बारे में पूछेगा कि" दादी क्या आपने गौरैया  को देखा है"| घर पहुँचते ही अर्श ने बस्ता एक तरफ रखा और दादी से लिपट गया| दादी ने भी प्यार से दुलारते हुए अर्श से पूछा क्या बात है बेटा! लगता है ,आज आपने जरूर कुछ नया सीखा  है | दादी अर्श के मन की बात को भली -भांति जानती है ,वह अर्श के मन के कोरे कागज को पढ़ लेती है| अर्श ने भी बिना विलम्ब के दादी से गौरैया के बारे में पूछ लिया ,और कहा कि,दादी क्या आपने गौरैया को देखा है | गौरैया का नाम सुनते ही दादी जी के साथ-साथ दादाजी की आँखे चमक उठी| इस विलुप्त होते जीव के साथ  जुडी जाने कितनी खट्टी-मीठी यादें उनके ह्रदय पटल पर आज भी अंकित है|
 दादी ने कहा " हाँ मैंने गौरैया को देखा है "| अर्श!  ,पहले खाना खा लो फिर मैं तुम्हे गौरैया के बारे में बताऊँगी | फिर तो अर्श ने आज बिना किसी ना-नुकुर के खाना खाया , गृहकार्य समाप्त किया और दादी से बोला ,"दादी अब बताओ गौरैया के बारे में |"बस अब क्या था ,दादी और दादू में तो जैसे होड़ ही लग गई अपनी स्मृतियों को उजागर करने की |खैर ,दादी ने आरम्भ किया   सुनो अर्श !," ये गौरैया एक छोटी सी ,प्यारी सी चिड़िया होती है | इसके साथ एक नर यानि कि चिड़ा होता है | हमारे समय में ये जीव हमारे घर का ,परिवार का हिस्सा होते थे" | दादा जी से रुका गया , वे बोल उठे -"जब हम छोटे थे अर्श, तब होली पर गौरैया को अपने पसंद के रंग में रंगकर उड़ा देते थे ,जब वो वापस आती थी तो हम बच्चे अपनी-अपनी चिड़िया को पहचान कर खूब प्रसन्न होते थे"| यह सुनते ही अर्श आश्चर्य चकित रह गया | उसने दादी से पुनः अनुरोध किया कि वे गौरैया के बारे में सारी बात बताये | दादी ने बात आगे बढ़ाई और बोली -"ये दोनों प्राणी (नर-मादा) मिलकर अपना घोंसला हमारे घरो में तस्वीरों के पीछे ट्यूब लाइट की आड़ में ,झरोखे में या फिर किसी सुविधाजनक स्थान ढूंढ़कर बना लेते थे| समय आने पर घोंसले में अंडे होते तथा अण्डों से बच्चे होते | दिनभर घर में उनकी आवाजों  से खूब रौनक रहती | दिनभर चिड़ा-चिड़िया बच्चों के लिए दाना लाते और उनके छोटे-छोटे मुख( चोंच ) में चोंच से दाना खिलाते | बड़ा ही मनोरम दृश्य होता था | अर्श के चेहरे पर आते -जाते भावों को दादी- दादू ने बखूबी जाना | अब अर्श ने पूछ ही लिया कि "दादी ये अब क्यों नहीं दिखती मुझे भी तो देखना है ,इतने प्यारे जीव को "| दादा जी ने कहा  बढ़ती आबादी, उद्योग -धंधों  एवं स्वार्थ के कारण मनुष्य जंगलों को काटता जा रहा है | भूमि की कमी के कारण घरों से आँगन समाप्त हो गए है , परिवार भी एकल हो गए हैं, बड़े घरों की जगह बहुमंजिली इमारतों ने ले ली हैं | इन्ही सब कारणों से यह नन्हा जीव अपना अस्तित्व खोता जा रहा है| यह सुनकर अर्श अत्यंत दुखी हो गया और बोला दादी "तो क्या मैं कभी भी गौरैया को नहीं देख पाऊँगा ,मुझे वह कभी नहीं दिखेगी ? " दादा जी ने कहा"क्यों नहीं बेटा , इस प्राणी का अस्तित्व खतरे में तो है किन्तु इसे बचाने का प्रयास किया जा रहा है | जगह-जगह कृत्रिम (बनावटी ) घोंसले बनाये जा रहे हैं तथा गौरैया पालन पर ध्यान दिया जा रहा है |"
अर्श ने दादी-दादू की सारी बातें बड़े ही ध्यान सी सुनी| अर्श का कोमल ह्रदय गौरैया के सपने देखने लगा | उसने अविलम्ब संकल्प लिया कि वह भी "गौरैया बचाओ" अभियान मेँ भाग लेगा | इस अभियान को वह अपनी सोसाइटी मेँ भी चलाएगा| बच्चों तथा बड़ों को इस अभियान के बारे मेँ बताकर उन्हें जागरूक करेगा | फिर वह गौरैया को पुस्तक मेँ नहीं बल्कि बाग़-बगीचे में ,पार्क मेँ तथा पेड़ों पर सजीव देखेगा | घरों मेँ फुदकती गौरैया को देखकर उसे बड़ी  प्रसन्नता  होगी  |

नीरा भार्गव  'नीर'



1 comment:

  1. कहानी पढ़िए एवं बच्चों को भी पढाये
    गौरैया बचाओ अभियान में भाग ले
    प्रकृति का संरक्षण हम सबका दायित्व है

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