Friday, 26 March 2021

 साहस न क्षमता है मुझमें, अनुकरण मैं उनका कर पाती,

शब्दों का तंत्र न बुना जाता, क्या अमर कृति मैं रच पाती !

न भक्ति मुझमें है इतनी, जो मैं उनकी मीरा बन पाती,

न प्रेम प्यास की ज्वाला है, जो मैं राधा बन जी पाती |

धधक रही है चिंगारी बस, जाने कब अगन बढ़ा देगी,

बन लक्ष्मीबाई रानी सी, करती  प्रहार मैं शब्दों के,

कुछ अमर कृति सी कर पाती |

नद सी चल-बहती नित ही, कलरव करती खग सा दिनभर, 

गुंजित करती मैं कुंज-कुंज, भर देती बयार में भीनी सुगंध |

कण-कण में तेरी गंध बसी, तुझमें ही राधा,वृंद बसी,

तेरी सत्ता देखी हरपल, जानी-परखी, समझी-बूझी,

अब लेकर कौन पहेली नई रचना करने की है सूझी ,

मन में उठता है द्वंद सदा, गढ़ने को शब्द-संसार नया     

रचने को शब्द नए-नए, फिर अवतार महादेवी लेगी |

नीरा भार्गव ‘नीर’

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