साहस न क्षमता है मुझमें, अनुकरण मैं उनका कर पाती,
शब्दों का तंत्र न बुना जाता, क्या अमर कृति मैं रच पाती !
न भक्ति मुझमें है इतनी, जो मैं उनकी मीरा बन पाती,
न प्रेम प्यास की ज्वाला है, जो मैं राधा बन जी पाती |
धधक रही है चिंगारी बस, जाने कब अगन बढ़ा देगी,
बन लक्ष्मीबाई रानी सी, करती प्रहार मैं शब्दों के,
कुछ अमर कृति सी कर पाती |
नद सी चल-बहती नित ही, कलरव करती खग सा दिनभर,
गुंजित करती मैं कुंज-कुंज, भर देती बयार में भीनी सुगंध |
कण-कण में तेरी गंध बसी, तुझमें ही राधा,वृंद बसी,
तेरी सत्ता देखी हरपल, जानी-परखी, समझी-बूझी,
अब लेकर कौन पहेली नई रचना करने की है सूझी ,
मन में उठता है द्वंद सदा, गढ़ने को शब्द-संसार नया
रचने को शब्द नए-नए, फिर अवतार महादेवी लेगी |
नीरा भार्गव ‘नीर’
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