कहानी
गर्वित और गिलहरी
बात उन दिनों
की है जब
गर्वित लगभग दस
वर्ष का था।
उसके माता-पिता
ने हाल ही
में नए घर
में शिफ्ट किया
था। इस घर
में दो बड़ी-
बड़ी बालकनी थी।
गर्वित को प्रकृति
से बड़ा प्रेम
है। पेड़-पौधे
छोटे-छोटे पक्षी
तथा जानवरों से
उसे बेहद लगाव है।
पढ़ने-खेलने तथा
माॅ की छोटी-मोटी मदद
के अलावा घर
के पौधों को
पानी देने का
काम उसकी दिनचर्या
में शामिल था।
प्रतिदिन की तरह गर्वित
पौधों को पानी
दे रहा था अचानक
उसकी निगाह बालकनी
में घूमती गिलहरी
पर पड़ी जो
उसे टुकुर- टुकुर
देख रही थी।
गर्वित ने उसे
ध्यान से देखा
मानों गिलहरी उससे
कह रही थी
कि गर्वित मुझे कुछ
खाने को दो
मैं भूखी हूॅ।
गर्वित उस समय
सेब खा रहा
था उसने गिलहरी
की तरफ एक
टुकड़ा बढ़ाया गिलहरी डरी
और फुरती से
भाग गई। जब
तक गर्वित समझ
पाता गिलहरी फिर
से आयी और
उसे अपनी छोटी-छोटी आॅखों
से देखने लगी।
गर्वित ने
गिलहरी की तरफ
फिर से एक
टुकड़ा बढ़ाया गिलहरी फिर
से भाग गई।
गर्वित को एक
तरकीब सूझी उसने
बालकनी के एक
कोने में सेब
का वह टुकड़ा
रख दिया। बस
अब क्या था
गिलहरी निडर होकर
आगे आई इधर-उधर देखा
कि कोई खतरा
तो नहीं है
और कुतर- कुतर
कर सेब खाने
लगी। अब यह
सिलसिला प्रतिदिन का शुरू
हो गया। गर्वित
जो कुछ भी
खाता गिलहरी को
ज़रूर देता। गिलहरी
भी रोज़ खुशी-खुशी बालकनी
में आती
गर्वित भी उसे
कुछ न कुछ
खाने को ज़रूर
देता। गर्वित और
गिलहरी में गहरी
दोस्ती हो गई।
एक दिन हमेशा
की भाति गर्वित
बालकनी में गिलहरी
को खाना दे
रहा था उस
बेजुबान प्राणी को देखकर
गर्वित को लगा
कि हमारी तरह
इसे भी तो
प्यास लगती होगी
गर्वित ने तुरंत
मा से पूछकर
नवरात्रों में प्रयोग
किया गया शकोरा
लिया और पानी
भरकर बालकनी के
एक कोने में
रख दिया। गिलहरी
रोज़ आती मज़े
से खाती पानी
पीती और फुदकती
तथा घूमती रहती।
थोड़े दिनों बाद
भीषण गर्मी शुरू
हो गई। पक्षी
पानी की तलाश
में भटकते रहते।
एक दिन एक
कबूतर की निगाह
पानी भरे शकोरे
पर पड़ी वह
उसमें से पानी
पीने लगा। उसकी
देखा-देखी अन्य
पक्षी भी पानी
पीने आने लगे।
गर्वित प्रतिदिन पानी भरने
लगा। इस प्रकार
गर्वित का एक
छोटा सा प्रयास
निरीह तथा मूक
प्राणियों के लिए
कितना मददगार साबित
हुआ यह केवल
मन से महसूस
की जा सकती
है।सभी पाठकों से नम्र
निवेदन है कि
प्रकृति के संरक्षण
में हम सभी
का आगे आना चाहिए।
इसके लिए हम
जो भी प्रयास
कर चाहे वह
कितना ही छोटा
क्यों न हो
एक दिन अवश्य
रंग लाएगा।
है तो
यह एक छोटा
सा किस्सा
किन्तु है यह
बिलकुल सच्चा
करो शुभारम्भ
परोपकार का
आज है
छोटा प्रयास यह
किन्तु याद रहे
यह बात
फतह करने
को हिमालय
उठता है
एक छोटा कदम
ही।
नीरा भार्गव 'नीर'
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