आता वसंत है .................................
कंक्रीट के जंगलों की ,ऊँची इमारतों के
छोटे से गमले में ,पौधों से फूटता
खुली खिड़की से झांकता ,
हर वर्ष आता वसन्त है I
गौरैया का
नाम नहीं ,
कोयल की तान नहीं ,
फिर भी आमों की डाली पर
बौराता सा सबको, महकाता
हर वर्ष आता वसन्त है I
शहरों से भागकर ,गॉवों की छाँव में
खेतों में पीली सरसों बन
धरा को वासंती चुनरिया पहना
माँ शारदे का कर आह्वान
मंद-मंद मुस्काता ,लहराता वसन्त है I
गर्व से प्रफुल्लित हो ,नवगीत गाती धरा
बसंती बयार औ रंगों के त्यौहार से
ज्ञान के प्रकाश से आलोकित कर
सरल ,मधुर,तरंगों संग ,प्यार भरा
देने सन्देश फिर आता वसन्त है I
नीरा भार्गव 'नीर'
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