Saturday, 9 January 2016

विकास बनाम नैतिकता (व्यंग्य)
विकास की लंबी दौड़ में ,
हो रहा नैतिकता का ह्रास
ये कैसा विकास है,जिसमें ,
नैतिकता का ह्रास है,
बढ़ते दायरों ने दिल
कर दिए हैं छोटे
अपने आप से है मतलब ,
विकास के नाम पर चाहे ,
किसी का भी दिल टूटे।
चेहरों पर न रही चमक,
रिश्तों में न रही महक,
बस! सिर्फ है तो ,पैसों की खनक।
पैसा खाते,ओढ़ते ,बिछाते हैं
पैसों की चकाचैंध में
रिश्तों को तोड़ते जाते हैं।
हो फिर रिश्ता कोई भी,
इंसानों का या फिर बेजुबानों का।
 वाह कैसा है विकास,
रिश्ते नहीं बल्कि हैं मज़ाक,
भौतिक विकास हो गया,
नैतिक विकास खो गया,
आत्मा तो सो गई,
देह कल (मशीन) समान हो गई,
कृत्रिम मुस्कान दे रहे,
दिखावे को ही रो रहे,
संवेदनाएँ मिट रहीं,
समयाभाव में पिट रहीं,
विकास की रफ्तार सेे ,
दिल हो गए हैं छोटे,
इसी लिए तो मेहमान आज बोझ हैं
अतिथि देवो भव ,
नहीं रही अब सोच है।
जितना किया विकास बड़ा,
पैसों की भूख ने किया ,
सुरसा समान मुख बड़ा।
सेवा भाव मिट गया,
है डाॅक्टरों का हठ नया,
पहले करो भुगतान सारा,
तभी हो सकेगा इलाज तुम्हारा
सुनते ही दुखी गरीब को
लगता है तमाचा करारा,
कहाॅ से और कैसे लाएगा
पैसा इतना सारा ?
राजनीति की भी हो जाए कुछ बात,
विकास और नैतिकता
कैसे चलते हैं साथ-साथ।
बेटे के जन्मदिन पर,
आशीर्वाद के रूप में
नेता जी ने दे डाली एक सीख,
बेटा रामलाल! तुम जीओ हज़ारों साल
बनो देश के दलाल,रहो सदा मालामाल,
करो सदा केवल अपना भला,
इसके लिए चाहे दबाना पड़े
दूसरों का गला।
अगर तुमने सीख लिया यह पाठ,
तो तुम इतना करोगे विकास
कि सदा तुम्हारे होंगे ठाठ-बाट।
अंततः यदि यही विकास है
जिसमें न रिश्तों की महक है
न नैतिकता की सुबास,
तो करना होगा संकल्प
लौटना होगा बीते युग में
जहाॅ राम के वनवास में भी
विकास है,रिश्तों में  मिठास है |
नीरा भार्गव  'नीर'

3 comments:

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  2. Garvit has been very caring for all aspects of nature. Action by a 10 year old has very deep meaning and inspiring.

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